किसान पर कविता – Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp and Facebook

किसान पर कविता – Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp and Facebook

August 17, 2018 1 By Rupesh Goyal

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किसान पर कविता हिंदी मैं – Kisan Par Kavita in Hindi

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देखता हूं नित दिन मैं एक इंसान को
धूप में जलता हुआ शिशिर में पिसता हुआ
वस्त्र है फटे हुए पांव हैं जले हुए
पेट-पीठ एक है बिना हेल्थ जोन गए हुए।
किसान पर कविता हिंदी मैं

खड़ी फसल जल रही
सूद-ब्याज बढ़ रही
पुत्र प्यासा रो रहा दूध के इंतजार में

फटी बिवाई कह रही
दीनता की कहानी
शब्दों के अभाव में
जो रह गई बेजुबानी
Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp And Facebook

जीवन निस्सार संगीत है
भविष्य भी भयभीत है
रो रहा वर्तमान है
सामने अंधकार है

कष्ट में वह पूछता है
कर्मफल कब पाऊंगा?
या यूं ही संघर्ष करता
परलोक सिधार जाऊंगा।

किसान पर कविता – Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp and Facebook

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बंजर सी धरती से सोना उगाने का माद्दा रखता हूँ,
पर अपने हक़ की लड़ाई लड़ने से डरता हूँ.
ये सूखा, ये रेगिस्तान, सुखी हुई फसल को देखता हूँ,
न दीखता कोई रास्ता तभी आत्महत्या करता हूँ .
उड़ाते हैं मखौल मेरा ये सरकारी कामकाज ,
बन के रह गया हूँ राजनीती का मोहरा आज .
क्या मध्य प्रदेश क्या महाराष्ट्र , तमिलनाडु से लेकर सौराष्ट्र ,
मरते हुए अन्नदाता की कहानी बनता, मै किसान हूँ !
साल भर करूँ मै मेहनत, ऊगाता हूँ दाना ,
ऐसी कमाई क्या जो बिकता बहार रुपया पर मिलता चार आना.
न माफ़ कर सकूंगा, वो संगठन वो दल,
राजनीती चमकाते बस अपनी, यहाँ बर्बाद होती फसल.
डूबा हुआ हूँ कर में , क्या ब्याज क्या असल,

उन्हें खिलाने को उगाया दाना, पर होगया मेरी ही जमीं से बेदखल.
बहुत गीत बने बहुत लेख छपे की मै महान हूँ,
पर दुर्दशा न देखी मेरी किसी ने, ऐसा मैं किसान हूँ !
लहलहाती फसलों वाले खेत अब सिर्फ सनीमा में होते हैं,
असलियत तो ये है की हम खुद ही एक-एक दाने को रोते हैं.
अब कहाँ रास आता उन्हें बगिया का टमाटर,
वो धनिया, वो भिंडी और वो ताजे ताजे मटर.
आधुनिक युग ने भुला दिया मुझे मै बस एक छूटे हुए सुर की तान हूँ,
बचा सके तो बचा ले मुझे ए राष्ट्रभक्त, मैं किसान हूँ !
किसान पर कविता हिंदी मैं

Kisan Par Kavita in Hindi – जय जवान जय किसान

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लिखता मैं किसान के लिए
मैं लिखता इंसान के लिए
नहीं लिखता धनवान के लिए
नहीं लिखता मैं भगवान के लिए
लिखता खेत खलियान के लिए
लिखता मैं किसान के लिए
नहीं लिखता उद्योगों के लिए
नहीं लिखता ऊँचे मकान के लिए
लिखता हूँ सड़कों के लिए
लिखता मैं इंसान के लिए
क़लम मेरी बदलाव बड़े नहीं लाई
नहीं उम्मीद इसकी मुझे
Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp And Facebook

खेत खलियान में बीज ये बो दे
सड़क का एक गढ्ढा भर देती
ये काफ़ी इंसान के लिए
लिखता हूँ किसान के लिए
लिखता मैं इंसान के लिए
आशा नहीं मुझे जगत पढ़े
पर जगत का एक पथिक पढ़े
फिर लाए क्रांति इस समाज के लिए
इसलिए लिखता मैं दबे-कुचलों के लिए
पिछड़े भारत से ज़्यादा
भूखे भारत से डरता हूँ
फिर हरित क्रांति पर लिखता हूँ
फिर किसान पर लिखता हूँ
किसान पर कविता हिंदी मैं

जय जवान जय किसान – किसान पर कविता हिंदी मैं

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जय भारतीय किसान
तुमने कभी नहीं किया विश्राम
हर दिन तुमने किया है काम
सेहत पर अपने दो तुम ध्यान
जय भारतीय किसान.
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अपना मेहनत लगा के
रूखी सूखी रोटी खा के
उगा रहे हो तुम अब धान
जय भारतीय किसान.

परिश्रम से बेटों को पढ़ाया
मेहनत का उनको पाठ सिखाया
लगाने के लिए नौकरी उनको
किसी ने नहीं दिया ध्यान
जय भारतीय किसान.

सभी के लिए तुमने घर बनाए
अपने परिवार को झोपडी में सुलाए
तुमको मिला नही अच्छा मकान
जय भारतीय किसान.

लोकगीत को गा के
सबके सोए भाग जगा के
उगा रहे हो तुम अब धान
जय भारतीय किसान.

Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp and Facebook – जय जवान जय किसान

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माना गरीब हूं मैं बेटा किसान का
मैं ही बनूंगा गौरव भारत महान का

मेरे घर नहीं तिजोरी
कपड़े हैं एक जोड़ी
लेने को पेन-कॉपी
नहीं है फूटी-कौड़ी
किसान पर कविता हिंदी मैं

कमजोर बना घर है टूटा हुआ छप्पर है
मजबूत चौखट प्रेम की पर लगी मेरे दर है

खजाना भरा है,
विचारों की शान का
मैं ही बनूंगा गौरव
भारत महान का

अभावों में मैं पला हूं भूख से भी मैं जला हूं
लेकिन ये पाई प्रेरणा सत्यपथ से न टला हूं।

न अंग्रेजी सीख पाया
न जीन्स-ट्राऊजर में मचलना
सीखा है मगर मैंने
सिद्धांतों पर चलना

बनूंगा मैं हिन्द का रखवाला आन का
मैं ही बनूंगा गौरव भारत महान का।

किसान पर कविता हिंदी मैं – Kisan Par Kavita in Hindi for Whatsapp and Facebook

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आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,
दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।

जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,
तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।
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गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,
मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।

बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,
कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।

जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,
सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।

मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,
कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।

दूसरों का पेट भर, अपनी जान तो दी,
आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।

कहें जो साधो, सुने अनाड़ी
किसको बात सुनायें
सब लोग आओ पारी पारी
कहें जो साधो सुने अनाड़ी

पढ़ा लिखा जो एमए पास
छील रहा वो मेड़ पर घास,
डिग्रीधारी सब मक्खी मारें
देश से जाने की हुई तैयारी।
कहें जो साधो, सुने अनाड़ी

जातिवाद पर जब दिये हो वोट
अब क्यों लगे कलेजे को चोट,
हिन्दू, मुस्लिम, दंगा, लफड़ा
प्रशासन हुआ है अत्याचारी
कहें जो साधो, सुने अनाड़ी।

बेघर हैं कुछ, कुछ भूंखे लोग
बाबा जी कहे करो तुम योग
भूख प्यास दुःख दूर भागे
और भागे दूर सारी बीमारी
कहें जो साधो, सुने अनाड़ी।
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गुस्से में बोली अरहर की दाल
सामने आये जो हो माँ का लाल
दरबे में दुबक के मुर्गी बोली
मुझको भी है जान प्यारी।
कहें जो साधो, सुने अनाड़ी

किसान मरें सूखा बरसात
राजा सुनाए मन की बात
पकौड़ा बेचने को रोजगार बताए
कहे, रही नहीं अब बेरोजगारी
कहें जो साधो, सुने अनाड़ी

कहें जो साधो, सुने अनाड़ी
किसको बात सुनायें
सब लोग आओ पारी पारी
कहें जो साधो सुने अनाड़ी
किसान पर कविता हिंदी मैं